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विश्व पत्र लेखन दिवस: स्याही से दिल तक का सफर

 बूंदी/नैनवां।  ३१ अगस्त २०२६,श्रवण कुमार गुर्जर (सवांददाता)

विश्व पत्र लेखन दिवस: स्याही से दिल तक का सफर

हस्तलिखित पत्रों की यादों से जुड़ा भावनात्मक रिश्ता, तकनीक के दौर में खोती जा रही है पत्रों की आत्मीयता

1 सितंबर को पूरे विश्व में विश्व पत्र लेखन दिवस मनाया जाता है। यह दिन उस दौर की याद दिलाता है, जब लोग अपनी भावनाओं, सुख-दुख और रिश्तों की बातों को शब्दों में पिरोकर कागज पर उतारा करते थे। हस्तलिखित पत्र केवल समाचार पहुंचाने का माध्यम नहीं थे, बल्कि उनमें भावनाओं और आत्मीयता की गहरी छाप होती थी।



डाकिए के इंतजार में बीतते थे दिन

एक समय था जब समाचारों के आदान-प्रदान का प्रमुख माध्यम पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और लिफाफे हुआ करते थे। घर-परिवार के लोग डाकिए के आने का बेसब्री से इंतजार करते थे। सुख-दुख की बातें, रिश्ते-नाते, शादी-ब्याह की खबरें और पारिवारिक समाचार पत्रों के माध्यम से ही एक-दूसरे तक पहुंचते थे।उस दौर में तार का भी अपना अलग महत्व था। तार आने की खबर सुनते ही लोगों के मन में आशंका पैदा हो जाती थी और अक्सर लोग इसे किसी बुरी खबर से जोड़कर देखते थे। तार के नाम मात्र से ही दिल की धड़कन बढ़ जाती थी।



पत्रों में गुस्सा भी था और अपनापन भी

उस समय महिलाएं भी अपनी भावनाओं को पत्रों के माध्यम से व्यक्त करती थीं। कई बार गुस्से या पीड़ा में लिखे गए पत्र डाक से भेजे जाते थे। पत्र को पहुंचने में पांच से सात दिन तक लग जाते थे। इस बीच समय के साथ गुस्सा और नाराजगी भी शांत हो जाती थी। यही कारण था कि रिश्तों में तत्काल प्रतिक्रिया के कारण होने वाले विवाद और बिखराव की संभावना कम रहती थी।

हस्तलिखित पत्रों की सबसे बड़ी खूबी उनकी भावनात्मक पहचान थी। लिखने वाले की लिखावट, शब्दों का चयन और कागज पर उतरती भावनाएं पत्र को विशेष बना देती थीं।

तकनीक ने बदला संवाद का तरीका

आज मोबाइल फोन और इंटरनेट ने संचार की दुनिया पूरी तरह बदल दी है। अब समाचारों और संदेशों का आदान-प्रदान कुछ ही सेकंड में हो जाता है। अच्छी हो या बुरी, हर खबर तुरंत सामने आ जाती है।तकनीक ने संवाद को तेज जरूर बनाया है, लेकिन पत्रों के साथ जुड़ा **इंतजार, उत्सुकता, अपनापन और भाव

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